महाभारत 7.113.9
वारणैः पतितै राजन्वाजिभिश्च नरैः सहअदृश्यत मही कीर्णा वातनुन्नैर्द्रुमैरिव
vāraṇaiḥ patitai rājanvājibhiśca naraiḥ sahaadṛśyata mahī kīrṇā vātanunnairdrumairiva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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