महाभारत 7.114.80
एवं तं विरथं कृत्वा कर्णो राजन्व्यकत्थतप्रमुखे वृष्णिसिंहस्य पार्थस्य च महात्मनः
evaṃ taṃ virathaṃ kṛtvā karṇo rājanvyakatthatapramukhe vṛṣṇisiṃhasya pārthasya ca mahātmanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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