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महाभारत 7.115.1
धृतराष्ट्र उवाच · dhṛtarāṣṭra uvāca
अहन्यहनि मे दीप्तं यशः पतति संजयहता मे बहवो योधा मन्ये कालस्य पर्ययम्
ahanyahani me dīptaṃ yaśaḥ patati saṃjayahatā me bahavo yodhā manye kālasya paryayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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