महाभारत 7.117.56
असत्यो विक्रमः पार्थ यत्र भूरिश्रवा रणेविशेषयति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम्
asatyo vikramaḥ pārtha yatra bhūriśravā raṇeviśeṣayati vārṣṇeyaṃ sātyakiṃ satyavikramam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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