महाभारत 7.117.59
प्रवरं वृष्णिवीराणां यन्न हन्याद्धि सात्यकिम्महाद्विपमिवारण्ये मृगेन्द्र इव कर्षति
pravaraṃ vṛṣṇivīrāṇāṃ yanna hanyāddhi sātyakimmahādvipamivāraṇye mṛgendra iva karṣati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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