महाभारत 7.120.5
नास्तमेति यथा सूर्यो यथा सत्यं भवेद्वचःचोदयाश्वांस्तथा कृष्ण यथा हन्यां जयद्रथम्
nāstameti yathā sūryo yathā satyaṃ bhavedvacaḥcodayāśvāṃstathā kṛṣṇa yathā hanyāṃ jayadratham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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