महाभारत 7.129.3
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रमाचार्यस्य महात्मनःके चोत्तरमरक्षन्त निघ्नतः शात्रवान्रणे
ke'rakṣandakṣiṇaṃ cakramācāryasya mahātmanaḥke cottaramarakṣanta nighnataḥ śātravānraṇe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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