महाभारत 7.131.65
शरवृष्टिं शरैर्द्रौणिरप्राप्तां तां व्यशातयत्ततोऽन्तरिक्षे बाणानां संग्रामोऽन्य इवाभवत्
śaravṛṣṭiṃ śarairdrauṇiraprāptāṃ tāṃ vyaśātayattato'ntarikṣe bāṇānāṃ saṃgrāmo'nya ivābhavat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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