Loading
महाभारत 7.133.44
संजय उवाच · saṃjaya uvāca
एवमुक्तस्तु राधेयः प्रहसन्भरतर्षभअब्रवीच्च तदा कर्णो गुरुं शारद्वतं कृपम्
evamuktastu rādheyaḥ prahasanbharatarṣabhaabravīcca tadā karṇo guruṃ śāradvataṃ kṛpam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें