महाभारत 7.136.10
द्रोणस्तु परमक्रुद्धो वायव्यास्त्रेण संयुगेव्यधमत्तान्यथा वायुर्मेघानिव दुरत्ययः
droṇastu paramakruddho vāyavyāstreṇa saṃyugevyadhamattānyathā vāyurmeghāniva duratyayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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