महाभारत 7.136.19
उत्सृज्य शतशो वाहांस्तत्र केचिन्नराधिपाःप्राद्रवन्त महाराज भयाविष्टाः समन्ततः
utsṛjya śataśo vāhāṃstatra kecinnarādhipāḥprādravanta mahārāja bhayāviṣṭāḥ samantataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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