महाभारत 7.139.6
असज्जन्त ततो वीरा वीरेष्वेव पृथक्पृथक्नागा नागैः समाजग्मुस्तुरगाः सह वाजिभिः
asajjanta tato vīrā vīreṣveva pṛthakpṛthaknāgā nāgaiḥ samājagmusturagāḥ saha vājibhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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