महाभारत 7.141.14
तमापतन्तं संरब्धं शैनेयस्य रथं प्रतिघटोत्कचोऽब्रवीद्राजन्नादं मुक्त्वा महारथः
tamāpatantaṃ saṃrabdhaṃ śaineyasya rathaṃ pratighaṭotkaco'bravīdrājannādaṃ muktvā mahārathaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें