महाभारत 7.142.42तं विजित्यार्जुनस्तूर्णं द्रोणान्तिकमुपाययौकिरञ्शरगणान्राजन्नरवारणवाजिषुtaṃ vijityārjunastūrṇaṃ droṇāntikamupāyayaukirañśaragaṇānrājannaravāraṇavājiṣuइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें