महाभारत 7.143.5
सोऽपेतवर्मा पुत्रस्ते विरराज भृशं नृपउत्सृज्य काले राजेन्द्र निर्मोकमिव पन्नगः
so'petavarmā putraste virarāja bhṛśaṃ nṛpautsṛjya kāle rājendra nirmokamiva pannagaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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