महाभारत 7.144.5
सुजिह्मं प्रेक्षमाणौ च राजन्विवृतलोचनौक्रोधसंरक्तनयनौ निर्दहन्तौ परस्परम्
sujihmaṃ prekṣamāṇau ca rājanvivṛtalocanaukrodhasaṃraktanayanau nirdahantau parasparam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें