Loading
महाभारत 7.145.12
तं दृष्ट्वा तु शरं घोरं देवगन्धर्वमानवाःस्वस्त्यस्तु समरे राजन्द्रोणायेत्यब्रुवन्वचः
taṃ dṛṣṭvā tu śaraṃ ghoraṃ devagandharvamānavāḥsvastyastu samare rājandroṇāyetyabruvanvacaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें