महाभारत 7.145.45
श्रुत्वा तु रथनिर्घोषं गाण्डीवस्य च निस्वनम्सूतपुत्रोऽब्रवीद्राजन्दुर्योधनमिदं वचः
śrutvā tu rathanirghoṣaṃ gāṇḍīvasya ca nisvanamsūtaputro'bravīdrājanduryodhanamidaṃ vacaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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