महाभारत 7.145.57
तत्र गच्छन्तु बहवः प्रवरा रथसत्तमाःयावत्पार्थो न जानाति सात्यकिं बहुभिर्वृतम्
tatra gacchantu bahavaḥ pravarā rathasattamāḥyāvatpārtho na jānāti sātyakiṃ bahubhirvṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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