महाभारत 7.146.29
पुनश्चैव शतेनास्य संरुरोध महारथम्तमर्जुनस्तु विंशत्या विव्याध युधि भारत
punaścaiva śatenāsya saṃrurodha mahārathamtamarjunastu viṃśatyā vivyādha yudhi bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें