महाभारत 7.146.34
अर्जुनस्तु द्रुतं गत्वा शकुनेर्धनुराच्छिनत्निन्ये च चतुरो वाहान्यमस्य सदनं प्रति
arjunastu drutaṃ gatvā śakunerdhanurācchinatninye ca caturo vāhānyamasya sadanaṃ prati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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