महाभारत 7.148.52
जहि कर्णं महेष्वासं निशीथे मायया रणेपार्था द्रोणं वधिष्यन्ति धृष्टद्युम्नपुरोगमाः
jahi karṇaṃ maheṣvāsaṃ niśīthe māyayā raṇepārthā droṇaṃ vadhiṣyanti dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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