महाभारत 7.148.56
जहि कर्णं रणे शूरं सात्वतेन सहायवान्यथेन्द्रस्तारकं पूर्वं स्कन्देन सह जघ्निवान्
jahi karṇaṃ raṇe śūraṃ sātvatena sahāyavānyathendrastārakaṃ pūrvaṃ skandena saha jaghnivān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें