महाभारत 7.149.23
अलंबलोऽपि विक्षिप्य समुत्क्षिप्य च राक्षसम्घटोत्कचं रणे रोषान्निष्पिपेष महीतले
alaṃbalo'pi vikṣipya samutkṣipya ca rākṣasamghaṭotkacaṃ raṇe roṣānniṣpipeṣa mahītale
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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