महाभारत 7.150.22स संनिपातस्तुमुलस्तयोरासीद्विशां पतेकर्णराक्षसयो राजन्निन्द्रशम्बरयोरिवsa saṃnipātastumulastayorāsīdviśāṃ patekarṇarākṣasayo rājannindraśambarayorivaइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें