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महाभारत 7.150.3
किंप्रमाणा हयास्तस्य रथकेतुर्धनुस्तथाकीदृशं वर्म चैवास्य कण्ठत्राणं च कीदृशम्पृष्टस्त्वमेतदाचक्ष्व कुशलो ह्यसि संजय
kiṃpramāṇā hayāstasya rathaketurdhanustathākīdṛśaṃ varma caivāsya kaṇṭhatrāṇaṃ ca kīdṛśampṛṣṭastvametadācakṣva kuśalo hyasi saṃjaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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