महाभारत 7.150.62
गत्वा कर्णरथाभ्याशं विचलत्कुण्डलाननःप्राह वाक्यमसंभ्रान्तः सूतपुत्रं विशां पते
gatvā karṇarathābhyāśaṃ vicalatkuṇḍalānanaḥprāha vākyamasaṃbhrāntaḥ sūtaputraṃ viśāṃ pate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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