महाभारत 7.153.31
अथाभिपत्य वेगेन समुद्भ्राम्य च राक्षसम्बलेनाक्षिप्य हैडिम्बश्चकर्तास्य शिरो महत्
athābhipatya vegena samudbhrāmya ca rākṣasambalenākṣipya haiḍimbaścakartāsya śiro mahat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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