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महाभारत 7.155.11
वासुदेव उवाच · vāsudeva uvāca
अतिहर्षमिमं प्राप्तं शृणु मे त्वं धनंजयअतीव मनसः सद्यः प्रसादकरमुत्तमम्
atiharṣamimaṃ prāptaṃ śṛṇu me tvaṃ dhanaṃjayaatīva manasaḥ sadyaḥ prasādakaramuttamam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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