महाभारत 7.155.22
कुण्डलाभ्यां निमायाथ दिव्येन कवचेन चतां प्राप्यामन्यत वृषा सततं त्वां हतं रणे
kuṇḍalābhyāṃ nimāyātha divyena kavacena catāṃ prāpyāmanyata vṛṣā satataṃ tvāṃ hataṃ raṇe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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