महाभारत 7.155.8
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दनतदद्य शंस मे पृष्टः सत्यं सत्यवतां वर
naitatkāraṇamalpaṃ hi bhaviṣyati janārdanatadadya śaṃsa me pṛṣṭaḥ satyaṃ satyavatāṃ vara
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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