महाभारत 7.16.22
ततो ज्वलनमादाय हुत्वा सर्वे पृथक्पृथक्जगृहुः कुशचीराणि चित्राणि कवचानि च
tato jvalanamādāya hutvā sarve pṛthakpṛthakjagṛhuḥ kuśacīrāṇi citrāṇi kavacāni ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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