महाभारत 7.164.111
तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकोपहतचेतसम्पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नः समाद्रवत्
taṃ dṛṣṭvā paramodvignaṃ śokopahatacetasampāñcālarājasya suto dhṛṣṭadyumnaḥ samādravat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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