महाभारत 7.164.83
हत्वा विंशतिसाहस्रान्पाञ्चालानां रथव्रजान्अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्
hatvā viṃśatisāhasrānpāñcālānāṃ rathavrajānatiṣṭhadāhave droṇo vidhūmo'gniriva jvalan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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