महाभारत 7.165.111
अश्वत्थाम्नि हते नैष युध्येदिति मतिर्ममहतं तं संयुगे कश्चिदाख्यात्वस्मै मृषा नरः
aśvatthāmni hate naiṣa yudhyediti matirmamahataṃ taṃ saṃyuge kaścidākhyātvasmai mṛṣā naraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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