महाभारत 7.165.30
श्वपाकवन्म्लेच्छगणान्हत्वा चान्यान्पृथग्विधान्अज्ञानान्मूढवद्ब्रह्मन्पुत्रदारधनेप्सया
śvapākavanmlecchagaṇānhatvā cānyānpṛthagvidhānajñānānmūḍhavadbrahmanputradāradhanepsayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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