महाभारत 7.169.47
अवरुह्य रथात्तं तु ह्रियमाणं बलीयसाउवाच श्लक्ष्णया वाचा सहदेवो विशां पते
avaruhya rathāttaṃ tu hriyamāṇaṃ balīyasāuvāca ślakṣṇayā vācā sahadevo viśāṃ pate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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