महाभारत 7.17.5
पश्यैतान्देवकीमातर्मुमूर्षूनद्य संयुगेभ्रातॄंस्त्रैगर्तकानेवं रोदितव्ये प्रहर्षितान्
paśyaitāndevakīmātarmumūrṣūnadya saṃyugebhrātṝṃstraigartakānevaṃ roditavye praharṣitān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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