महाभारत 7.170.42ये त्वेतत्प्रतियोत्स्यन्ति मनसापीह केचननिहनिष्यति तान्सर्वान्रसातलगतानपिye tvetatpratiyotsyanti manasāpīha kecananihaniṣyati tānsarvānrasātalagatānapiइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें