महाभारत 7.170.56
तस्य रूपमभूद्राजन्भीमसेनस्य संयुगेखद्योतैरावृतस्येव पर्वतस्य दिनक्षये
tasya rūpamabhūdrājanbhīmasenasya saṃyugekhadyotairāvṛtasyeva parvatasya dinakṣaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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