महाभारत 7.170.57
तदस्त्रं द्रोणपुत्रस्य तस्मिन्प्रतिसमस्यतिअवर्धत महाराज यथाग्निरनिलोद्धतः
tadastraṃ droṇaputrasya tasminpratisamasyatiavardhata mahārāja yathāgniraniloddhataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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