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महाभारत 7.172.44
तं द्रौणिरग्रतो दृष्ट्वा स्थितं कुरुकुलोद्वहसन्नकण्ठोऽब्रवीद्वाक्यमभिवाद्य सुदीनवत्
taṃ drauṇiragrato dṛṣṭvā sthitaṃ kurukulodvahasannakaṇṭho'bravīdvākyamabhivādya sudīnavat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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