महाभारत 7.173.2
संजय उवाच · saṃjaya uvāca
तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वैकौरवेषु च भग्नेषु कुन्तीपुत्रो धनंजयः
tasminnatirathe droṇe nihate pārṣatena vaikauraveṣu ca bhagneṣu kuntīputro dhanaṃjayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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