महाभारत 7.173.45
आपश्चुक्षुभिरे सर्वाश्चकम्पे च वसुंधरापर्वताश्च व्यशीर्यन्त दिशो नागाश्च मोहिताः
āpaścukṣubhire sarvāścakampe ca vasuṃdharāparvatāśca vyaśīryanta diśo nāgāśca mohitāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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