महाभारत 7.173.50
रुद्रस्य यज्ञभागं च विशिष्टं ते न्वकल्पयन्भयेन त्रिदशा राजञ्शरणं च प्रपेदिरे
rudrasya yajñabhāgaṃ ca viśiṣṭaṃ te nvakalpayanbhayena tridaśā rājañśaraṇaṃ ca prapedire
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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