महाभारत 7.18.23ततः संशप्तकव्रातान्साश्वद्विपरथायुधान्उवाह भगवान्वायुः शुष्कपर्णचयानिवtataḥ saṃśaptakavrātānsāśvadviparathāyudhānuvāha bhagavānvāyuḥ śuṣkaparṇacayānivaइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें