महाभारत 7.19.44विषाणाभिहताश्चापि केचित्तत्र गजा गजैःचक्रुरार्तस्वरं घोरमुत्पातजलदा इवviṣāṇābhihatāścāpi kecittatra gajā gajaiḥcakrurārtasvaraṃ ghoramutpātajaladā ivaइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें