महाभारत 7.19.55
प्रमथ्य च विषाणाग्रैः समुत्क्षिप्य च वारणैःसचक्राश्च विचक्राश्च रथैरेव महारथाः
pramathya ca viṣāṇāgraiḥ samutkṣipya ca vāraṇaiḥsacakrāśca vicakrāśca rathaireva mahārathāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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