महाभारत 7.24.38
दुर्मुखस्तु महेष्वासो वीरं पुरुजितं बलीद्रोणायाभिमुखं यान्तं कुन्तिभोजमवारयत्
durmukhastu maheṣvāso vīraṃ purujitaṃ balīdroṇāyābhimukhaṃ yāntaṃ kuntibhojamavārayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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