महाभारत 7.25.2
किमर्जुनश्चाप्यकरोत्संशप्तकबलं प्रतिसंशप्तका वा पार्थस्य किमकुर्वत संजय
kimarjunaścāpyakarotsaṃśaptakabalaṃ pratisaṃśaptakā vā pārthasya kimakurvata saṃjaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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